राम रघुवर रघुनाथ रघुनन्दना
प्रभु के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
लोक शिक्षण हेतु प्रभु अवतार होत
जिनकी करुणा से भूमि दुखवार होत
सह सकत न दीनन करुण क्रंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
रोम-रोम काम कोटिक गुलाम है
सिया प्राणप्रिया प्रियतम श्री राम हैं
जिनकी समता में कोटिक रवि चंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
सारी दुनिया में अप्रतिम प्रभाव है
किन्तु कोमल अति सरल स्वभाव है
जिनको द्वार है काहू के हित वंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
राजगद्दी मिले या वनवास हो
जिनके हिय में हरष ना हरास हो
होय दिव्य मुख चंद्रकाहू अनंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
जिनका दीनन के प्रति सहज प्यार है
ऐसो और कौन जग में उदार है
करे दीनन के दुःख को निकंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
नाथ पतित को पावन बनावते
दीन दुर्बल प्रभु के मन भावते
जिन्हें भावे ना कपट छल छंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
दीन शबरी को माँ तुल्य मानते
गीध को भी पिता सा सनमानते
जिन्हें व्यापे जगत के दुःख वंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
जिन्हें सेवक हैं पुकारते सुहावते
भक्त प्रेमी हैं जिन्हें भावते
जिन्हें आलस प्रमाद है पसंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
अपने शत्रु का करते जो भी हित हैं
भालू वानर निषाद जिनके मित्र हैं
तपत हिय हित है शीतल जिन चंदना
हरि के चरनन में कोटि-कोटि वंदना
संकलनकर्ता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Twitter: @abhimaitrey
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