पलक पांवड़े हम, बिछा कर के बैठे हैं
करुणा करो आओ दर्शन तो दे दो राम
ब्रह्मज्ञानी की सेवा से हटकर
शरण ना मिलेगी त्रिलोक भटक कर
दयनीय दशा से, बचा दो राम
करुणा करो आओ दर्शन तो दे दो राम
सृष्टि तुम्हारी हम भी तुम्हारे हैं
दृष्टि हमारी देखें तेरे सहारे है
चंचल मन को, निश्चल कर दो राम
करुणा करो आओ दर्शन तो दे दो राम
कल्पित जग का दूर करो यह भ्रम
हे अविनाशी अचिंत्य पारब्रह्म
दिव्य संस्कारों का सृजन मुझमें कर दो राम
करुणा करो आओ दर्शन तो दे दो राम
रचयिता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Twitter: @abhimaitrey
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