Wednesday, 10 December 2025

काहे को इतना करे अभिमान

अपना अहम् तज बन इंसान
काहे को इतना करे अभिमान
तेरी करनी को देख रहे भगवान
काहे को इतना करे अभिमान

समय चक्र चलता जायेगा
रोके से ना रुक पायेगा
अच्छा बुरा जैसा कर्म करेगा
प्रभु से ना कुछ छुप पायेगा
जान के खुद ना बन नादान
काहे को इतना करे अभिमान

जिनके लिए सब बंधन पाले
सुख उनको खुद खाये निवाले
धर्म कर्म सब ताक पे रखकर
बिन भय कर्म करे मतवाले
संग चले ना दुकान ना मकान
काहे को इतना करे अभिमान

रावण ने अभिमान था पाला
सीता माँ को था हर डाला
प्रभु राम से बैर था पाला
लंका को धूमिल कर डाला
राज मिटा और गया सम्मान
काहे को इतना करे अभिमान

रचयिता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"

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