अपना अहम् तज बन इंसान
काहे को इतना करे अभिमान
तेरी करनी को देख रहे भगवान
काहे को इतना करे अभिमान
समय चक्र चलता जायेगा
रोके से ना रुक पायेगा
अच्छा बुरा जैसा कर्म करेगा
प्रभु से ना कुछ छुप पायेगा
जान के खुद ना बन नादान
काहे को इतना करे अभिमान
जिनके लिए सब बंधन पाले
सुख उनको खुद खाये निवाले
धर्म कर्म सब ताक पे रखकर
बिन भय कर्म करे मतवाले
संग चले ना दुकान ना मकान
काहे को इतना करे अभिमान
रावण ने अभिमान था पाला
सीता माँ को था हर डाला
प्रभु राम से बैर था पाला
लंका को धूमिल कर डाला
राज मिटा और गया सम्मान
काहे को इतना करे अभिमान
रचयिता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
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