तेरा किसी ने पार न पाया, हे परमेश्वर जगतपिता
तुमको कोई समझ न पाया, हे परमेश्वर जगतपिता
हे परमेश्वर जगतपिता, हे परमेश्वर जगतपिता
कभी ज्ञानी तुम कभी ध्यानी तुम, हर घट में ब्रह्मज्ञानी तुम
चर भी तुम अचर भी तुम, प्रभु चराचर स्वामी तुम
महिमा तेरी गा ना पाया, हे परमेश्वर जगतपिता .....
नख से लेकर शिख तक मेरे प्रभु तुम्हारा वास है
चाहे कहीं भी रहूँ जगत में, दिल तुम्हारे पास है
सारे जगत में तेरी छाया, हे परमेश्वर जगतपिता .....
मुझको जैसे हाल रखोगे वैसे ही रह लूँगा मैं
खाने को जो टुकड़ा दोगे, वो प्रसाद खा लूँगा मैं
तेरी कृपा से नर तन पाया, हे परमेश्वर जगतपिता .....
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे में तेरा रूप अनूप है
सबमें तेरी माया प्रभुजी, कहीं छाया कहीं धूप है
गुरु रूप में खुद चल आया, हे परमेश्वर जगतपिता .....
जैसे भी हैं हम हैं तुम्हारे, स्वीकारो भव पार करो
पतित अधम भी तारे तुमने, मेरा भी उद्धार करो
द्वार तिहारे बालक आया, हे परमेश्वर जगतपिता .....
जित देखूं उत तुम नारायण, और नजर न कोई आये
जिसने अंतर्ज्योत जगाई, तुमको विरला सोई पाए
“शुभ” ह्रदय में बैठा पाया, हे परमेश्वर जगतपिता .....
दुस्तर हैं जीवें की राहें, चलना बहुत कठिन है
पग-पग पर कांटें मिलते हैं, बचना बहुत कठिन है
ऐसे में तुमने ही बचाया, हे परमेश्वर जगतपिता .....
रचयिता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
X (twitter): @abhimaitrey
No comments:
Post a Comment