तुमने ही दया करके, बिगड़े काज बनाये ।
तुम दाता हो दयालु, सबके ही काम आए ॥
हरि नाम का खजाना, भीतर दिखा रहे हो
जिसे ढूंढते हैं बाहर, ख़ुद में बता रहे हो
बिन सदगुरु के बन्दे, इसको ना साध पाये
तुम दाता हो दयालु, सबके ही काम आये....
तेरे दरश का प्यासा, मनवा ये रो रहा है
कैसे संभालूँ इसको, सुध अपनी खो रहा है
नैनों से बहते मोती, छुपते नहीं छुपाये
तुम दाता हो दयालु, सबके ही काम आये....
"शुभ" दोनों हाथ फैले, सदगुरु तुम्हारे आगे
नश्वर की नाही इच्छा, भक्ति प्रभु की मांगे
ऐसी अवस्था ला दो, हम ब्रह्मज्ञान पायें
तुम दाता हो दयालु, सबके ही काम आये....
मेरी हैसियत ही क्या थी, जो तुम ना साथ होते
जीवन ये जा रहा था, कभी हँसते कभी रोते
समता के पाठ तुमने, अदभुत दिए सिखाये
तुम दाता हो दयालु, सबके ही काम आये....
रचयिता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
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