मेरी गिनती मेरी विनती, तुम्ही से ही शुरू होती
जहाँ तक जाये मेरी दृष्टि, छवि तेरी प्रकट होती
सुखी जीवन के तुम आधार, सदा करते हो भव से पार
चरण धूलि जो आँखों में, लगा लूँ तो बने ज्योति
जहाँ तक जाये मेरी दृष्टि, छवि तेरी प्रकट होती
गुरुवर आपने अपने ह्रदय में, "शुभ" जगह दे दी
बड़ी कृपा की वरना मेरी तो, किस्मत थी सोती
जहाँ तक जाये मेरी दृष्टि, छवि तेरी प्रकट होती
करूँ चिंतन सदा तेरा, बने ऐसा ही मन मेरा
ह्रदय बन जाये गुरुद्वारा, वाणी हो जाये गंगोत्री
जहाँ तक जाये मेरी दृष्टि, छवि तेरी प्रकट होती
गुरुवर परम हितैषी हैं, ये वेदों ने बताया है
दिया "शुभ" आत्म का आनंद, किया कंकड़ से मोती
जहाँ तक जाये मेरी दृष्टि, छवि तेरी प्रकट होती
रचयिता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
01/01/2002
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