मोहे ले चलो गुरूजी के धाम
मेरा मन लागे वहाँ ..........
राम भी वो हैं, घनश्याम भी वो हैं
मेरी सुबह और शाम भी वो हैं
जिन्हें कहते हैं बापू आसाराम
मेरा मन लागे वहाँ ..........
मेरे ह्रदय की व्यथा वो जानें
घट-घट में क्या है पहचानें
ऐसे संत बापू को प्रणाम
मेरा मन लागे वहाँ ..........
हर मन का अँधियारा मिटावें
ज्ञान ज्योत से उज्जवल बनावें
देते खुद को नहीं विश्राम
मेरा मन लागे वहाँ ..........
हर पल तेरा नाम जपूँ मैं
क्षण-क्षण तेरा ध्यान धरूँ मैं
"शुभ" मन में पधारो मेरे राम
मेरा मन लागे वहाँ ..........
जप तप सेवा कर्म कराते
सत्संग की गंगा में नहलाते
बापू करते सभी का कल्याण
मेरा मन लागे वहाँ ..........
रचयिता : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
18/02/2002
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